
आज वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे है — लेकिन झारखंड में जमीनी सच्चाई यह है कि पत्रकार आज़ाद नहीं, बल्कि असुरक्षित हैं।
हर दिन सच दिखाने वाले रिपोर्टर धमकियों, हमलों और दबाव के बीच काम करने को मजबूर हैं। सवाल ये है कि आखिर कब तक?
राज्य की सत्ता संभाल रही झारखंड सरकार बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर पत्रकारों की सुरक्षा लगभग शून्य है।
ना कोई ठोस सुरक्षा नीति,
ना हेल्थ इंश्योरेंस,
ना आकस्मिक सहायता।
अगर कोई पत्रकार घायल हो जाए या जान गंवा दे — तो परिवार के लिए सिर्फ आश्वासन बचता है, व्यवस्था नहीं।
और सबसे गंभीर आरोप यह है कि सत्ता से जुड़े मुद्दों को उजागर करने पर पत्रकारों पर ही दबाव बनाया जाता है। कहीं नोटिस, कहीं केस, तो कहीं सीधे धमकी — क्या यही प्रेस की आज़ादी है?
क्या सरकार को सिर्फ अपनी छवि की चिंता है, पत्रकारों की नहीं?
क्या सच लिखना अब जोखिम भरा अपराध बन चुका है?
झारखंड में कई मामलों में हमले हुए, लेकिन कार्रवाई धीमी या अधूरी रही। इससे अपराधियों का मनोबल बढ़ता है और पत्रकारों में डर बैठता है।
अब वक्त आ गया है कि सरकार जवाब दे —
सिर्फ बयान नहीं, नीति चाहिए।
सिर्फ वादे नहीं, सुरक्षा की गारंटी चाहिए।
क्योंकि अगर पत्रकार डर गए, तो जनता तक सच कभी नहीं पहुंचेगा — और लोकतंत्र सिर्फ एक दिखावा बनकर रह जाएगा।
सत्य की खोज और निष्पक्ष पत्रकारिता ही लोकतंत्र की असली शक्ति है। विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर सभी पत्रकार साथियों को हार्दिक शुभकामनाएँ।”
— अविनाश शर्मा, संपादक: न्यूज़ टाइम्स झारखण्ड